Results for तंत्र साधना

समस्त कार्यसिद्धिकारक गणेश मंत्र

August 02, 2013
भगवान् गणेश को सर्वव्याधि निवारक एवं सुख समृद्धि प्रदायक देव माना जाता है l इनकी उपासना भी शीघ्र फल प्रदायक होती है l  जिस घर में सुबह एवं  शाम को इनके नाम का उच्चारण ,जप अथवा पूजन होता है वहां कभी भी नकारात्मक शक्तियां ठहर नहीं सकती l आज मै आप लोगों के लिए तंत्र की दुनिया के महत्वपूर्ण एवं अति प्राचीन ग्रन्थ रूद्रायमल तंत्र से कुछ शीघ्र प्रभावी मंत्र ले कर आया हूँ l ये सर्व कार्यसिद्धि प्रदायक  गणेश जी का महत्वपूर्ण मंत्र है l इस मंत्र से साधक सर्वजन वशीकरण ,आर्थिक मुसीबतें या फिर जिंदगी की कोई अन्य छोटी या बड़ी मुसीबतें सब पर विजय प्राप्त कर लेता है l इस मंत्र की सिद्धि प्राप्त करने के बाद साधक के शरीर में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा समाहित होने लगती है ,जिसके प्रभाव से साधक को अपने अन्दर एक दिव्य शक्ति का आभास होने लगता है ,या यूं कहें की साधक के लिए कोई भी उपरोक्त वर्णित कार्य असंभव नहीं होते


मंत्र -
देव देव महाआरण्य  माता वरुण पिता शांडिलगोत्रवाहनभू अग्ने स्वाहा l
विद्या क्लीं क्लीं कटुस्वाहा l
सर्वासां सिद्धिनां स्वाहा l
हं षं षं  लोकाय स्वाहा l
रक्ततुंडाय स्वाहा l
नजगजीक्षस्वामी  नजगजीक्षस्वामी l

विधि - साधक इस साधना को किसी भी शुभ पक्ष के बुधवार की रात्रि को संपन्न करे  सर्वप्रथम साधक स्वच्छ वस्त्र धारण कर संकल्प ले फिर घी का दीपक जलाकर  आसन पूजन ,गुरु पूजन ,गुरु मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला से संपन्न करे ,  फिर भगवान् गणेश को भोग आदि समर्पित कर उनसे इस साधना की अनुमति लें l तत्पश्चात उत्तराभिमुख हो कर उपरोक्त मंत्र को गणेश जी की तस्वीर अथवा मूर्ति के समक्ष  ११०८ की संख्या में जप करे  l जप की समाप्ति पर दशांश हवन करे, इस प्रकार ये मंत्र सिद्ध हो जाता है
मन्त्र सिद्धि के बाद भी साधक को इस मंत्र का जप करते रहना चाहिए जिससे की इस मंत्र का प्रभाव साधक एवं साधक के परिवार पर बना रहता है l वस्तुतः ये एक महत्वपूर्ण साधना है जो रोग ,भय, दरिद्रता ,शत्रु सम्मोहन आदि में शीघ्र प्रभावशाली हैl  
अंत में मै अपने साधकों से इतना जरूर कहूँगा की तंत्र एवं मंत्र का जब भी प्रयोग करें अपनी एवं समाज की भलाई के लिए ही प्रयोग करें ,क्योंकि मै व्यक्तिगत रूप से ऐसे कई साधकों को जानता हूँ जिन्होंने अपनी सिद्धियों का दुरूपयोग करके अपना एवं अपने परिवार का सब कुछ तबाह कर लिया
 
समस्त कार्यसिद्धिकारक गणेश मंत्र समस्त कार्यसिद्धिकारक गणेश मंत्र  Reviewed by Unknown on August 02, 2013 Rating: 5

आकर्षण के लिए त्राटक साधना

August 09, 2012
आँखे ही किसी मनुष्य के विचार , सोंच ,एवं भावनाओं की माध्यम होती हैं ,कई बार हम खुद भी महसूस करतें हैं की अमुक व्यक्ति से मिलने पर एक अजीब तरह का आकर्षण अनुभव हुआ या किसी व्यक्ति से मिलने पर मन में अजीब सी तरंग जाग्रत हो उठी .इस सबमें व्यक्ति के  व्यक्तित्व का कोई योगदान नहीं होता ,ये सब उसकी आँखों से निकली हुई तरंगे होती हैं जिन्हें हम आकर्षण या सम्मोहन की संज्ञा देतें हैं .ये आकर्षण सभी प्राप्त कर सकते हैं जिसे साधना की भाषा में त्राटक क्रिया कहा जाता है , इस क्रिया   के द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण, दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, सम्मोहन, आकर्षण, अदृश्य वस्तु को देखना, दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है. प्रबल इच्छाशक्ति से साधना करने पर सिद्धियाँ स्वयमेव आ जाती हैं। तप में मन की एकाग्रता को प्राप्त करने की अनेकानेक पद्धतियाँ योग शास्त्र में निहित हैं, इनमें 'त्राटक' उपासना सर्वोपरि है. हठयोग में इसको दिव्य साधना से संबोधित करते हैं,त्राटक के द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है.

इससे विचारों का संप्रेषण, दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, सम्मोहन, आकर्षण, अदृश्य वस्तु को देखना, दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। यह साधना लगातार तीन महीने तक करने के बाद उसके प्रभावों का अनुभव साधक को मिलने लगता है। इस साधना में उपासक की असीम श्रद्धा, धैर्य के अतिरिक्त उसकी पवित्रता भी आवश्यक है.
"तप में मन की एकाग्रता को प्राप्त करने की अनेकानेक पद्धतियाँ योग शास्त्र में निहित हैं। इनमें 'त्राटक' उपासना सर्वोपरि है। हठयोग में इसे दिव्य साधना कहते हैं। त्राटक के द्वारा मन की एकाग्रता,वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से संकल्प को पूर्ण कर लेता है"

विधि : 
  1. यह सिद्धि रात्रि में अथवा किसी अँधेरे वाले स्थान पर करना चाहिए, 
  2. प्रतिदिन लगभग एक निश्चित समय पर बीस मिनट तक करना चाहिए, स्थान शांत एकांत ही रहना चाहिए। साधना करते समय किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आए, इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए.
  3.  शारीरिक शुद्धि व स्वच्छ ढीले कपड़े पहनकर किसी आसन पर बैठ जाइए अपने आसन से लगभग तीन फुट की दूरी पर मोमबत्ती अथवा दीपक को आप अपनी आँखों अथवा चेहरे की ऊँचाई पर रखिए. अर्थात एक समान दूरी पर दीपक या मोमबत्ती, जो जलती रहे, जिस पर उपासना के समय हवा नहीं लगे व वह बुझे भी नहीं, इस प्रकार रखिए.
  4.  इसके आगे एकाग्र मन से व स्थिर आँखों से उस ज्योति को देखते रहें, जब तक आँखों में कोई अधिक कठिनाई नहीं हो तब तक पलक नहीं गिराएँ, यह क्रम प्रतिदिन जारी रखें धीरे-धीरे आपको ज्योति का तेज बढ़ता हुआ दिखाई देगा, कुछ दिनों उपरांत आपको ज्योति के प्रकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देगा
  5. इस स्थिति के पश्चात उस ज्योति में संकल्पित व्यक्ति व कार्य भी प्रकाशवान होने लगेगा, इस आकृति के अनुरूप ही घटनाएँ जीवन में घटित होने लगेंगी, इस अवस्था के साथ ही आपकी आँखों में एक विशिष्ट तरह का तेज आ जाएगा, जब आप किसी पर नजरें डालेंगे, तो वह आपके मनोनुकूल कार्य करने लगेगा.
  6. इस सिद्धि का उपयोग सकारात्मक तथा निरापद कार्यों में करने से त्राटक शक्ति की वृद्धि होने लगती है. दृष्टिमात्र से अग्नि उत्पन्न करने वाले योगियों में भी त्राटक सिद्धि रहती है, इस सिद्धि से मन में एकाग्रता, संकल्प शक्ति व कार्य सिद्धि के योग बनते हैं, कमजोर नेत्र ज्योति वालों को इस साधना को शनैः-शनैः वृद्धिक्रम में करना चाहिए.
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पंचमुखी हनुमानजी

July 16, 2012

शास्त्रो विधान से हनुमानजी का पूजन और साधना विभिन्न रुप से किये जा सकते हैं।
हनुमानजी का एकमुखी,पंचमुखीऔर एकादश मुखीस्वरूप के साथ हनुमानजी का बाल हनुमान, भक्त हनुमान, वीर हनुमान, दास हनुमान, योगी हनुमान आदि प्रसिद्ध है। किंतु शास्त्रों में श्री हनुमान के ऐसे चमत्कारिक स्वरूप और चरित्र की भक्ति का महत्व बताया गया है, जिससे भक्त को बेजोड़ शक्तियां प्राप्त होती है। श्री हनुमान का यह रूप है – पंचमुखी हनुमान
मान्यता के अनुशार पंचमुखीहनुमान का अवतार भक्तों का कल्याण करने के लिए हुआ हैं, हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित हैं.
पंचमुखीहनुमानजी का अवतार मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को माना जाता हैं. रुद्र के अवतार हनुमान ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं इसकी आराधना से बल, कीर्ति, आरोग्य और निर्भीकता बढती है.
रामायण के अनुसार श्री हनुमान का विराट स्वरूप पांच मुख पांच दिशाओं में हैं। हर रूप एक मुख वाला, त्रिनेत्रधारी यानि तीन आंखों और दो भुजाओं वाला है। यह पांच मुख नरसिंह, गरुड, अश्व, वानर और वराह रूप है। हनुमान के पांच मुख क्रमश:पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊ‌र्ध्व दिशा में प्रतिष्ठित माने गएं हैं.
पंचमुख हनुमान के पूर्व की ओर का मुख वानर का हैं। जिसकी प्रभा करोडों सूर्यो के तेज समान हैं। पूर्व मुख वाले हनुमान का पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है.
पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड का हैं। जो भक्तिप्रद, संकट, विघ्न-बाधा निवारक माने जाते हैं। गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं.

हनुमानजी का उत्तर की ओर मुख शूकर का है इनकी आराधना करने से अपार धन-सम्पत्ति,ऐश्वर्य, यश, दिर्धायु प्रदान करने वाल व उत्तम स्वास्थ्य देने में समर्थ हैं.
हनुमानजी का दक्षिणमुखी स्वरूप भगवान नृसिंह का है ,जो भक्तों के भय, चिंता, परेशानी को दूर करता हैं।
श्री हनुमान का ऊ‌र्ध्वमुख घोडे के समान हैं. हनुमानजी का यह स्वरुप ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए. कष्ट में पडे भक्तों को वे शरण देते हैं ऐसे पांच मुंह वाले रुद्र कहलाने वाले हनुमान बडे कृपालु और दयालु हैं
हनुमतमहाकाव्य में पंचमुखीहनुमान के बारे में एक कथा हैं
एक बार पांच मुंह वाला एक भयानक राक्षस प्रकट हुआ, उसने तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान पाया कि मेरे रूप जैसा ही कोई व्यक्ति मुझे मार सके. ऐसा वरदान प्राप्त करके वह समग्र लोक में भयंकर उत्पात मचाने लगा. सभी देवताओं ने भगवान से इस कष्ट से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की. तब प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, गरुड, अश्व और शूकर का पंचमुख स्वरूप धारण किया. इस लिये ऐसी मान्यता है कि पंचमुखीहनुमान की पूजा-अर्चना से सभी देवताओं की उपासना के समान फल मिलता है, हनुमान के पांचों मुखों में तीन-तीन सुंदर आंखें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीनों तापों को छुडाने वाली हैं. ये मनुष्य के सभी विकारों को दूर करने वाले माने जाते हैं.
पंचमुखी हनुमान जी की उपासना समस्त प्रकार के कष्टों को दूर करने वाली है .संकट के समय संकट मोचन हनुमान स्त्रोतम का पाठ करना अत्यधिक लाभदायक फल को प्रदान करने वाला है .प्रतिदिन सुबह स्नान आदि  से निवृत्त होकर एक पाठ हनुमान स्त्रोतम का जाप करने से इसके चमत्कारिक प्रभाव कुछ दिनों में ही दिखने लगते हैं .



संकट मोचन हनुमान् स्तोत्रम्




काहे विलम्ब करो अंजनी-सुत ,संकट बेगि में होहु सहाई ।।
नहिं जप जोग न ध्यान करो ,तुम्हरे पद पंकज में सिर नाई ।।
खेलत खात अचेत फिरौं ,ममता-मद-लोभ रहे तन छाई ।।
हेरत पन्थ रहो निसि वासर ,कारण कौन विलम्बु लगाई ।।
काहे विलम्ब करो अंजनी सुत ,संकट बेगि में होहु सहाई ।।
जो अब आरत होई पुकारत ,राखि लेहु यम फांस बचाई ।।
रावण गर्वहने दश मस्तक ,घेरि लंगूर की कोट बनाई ।।
निशिचर मारि विध्वंस कियो ,घृत लाइ लंगूर ने लंक जराई ।।
जाइ पाताल हने अहिरावण ,देविहिं टारि पाताल पठाई ।।
वै भुज काह भये हनुमन्त ,लियो जिहि ते सब संत बचाई ।।
औगुन मोर क्षमा करु साहेब ,जानिपरी भुज की प्रभुताई ।।
भवन आधार बिना घृत दीपक ,टूटी पर यम त्रास दिखाई ।।
काहि पुकार करो यही औसर ,भूलि गई जिय की चतुराई ।।
गाढ़ परे सुख देत तु हीं प्रभु ,रोषित देखि के जात डेराई ।।
छाड़े हैं माता पिता परिवार ,पराई गही शरणागत आई ।।
जन्म अकारथ जात चले ,अनुमान बिना नहीं कोउ सहाई ।।
मझधारहिं मम बेड़ी अड़ी ,भवसागर पार लगाओ गोसाईं ।।
पूज कोऊ कृत काशी गयो ,मह कोऊ रहे सुर ध्यान लगाई ।।
जानत शेष महेष गणेश ,सुदेश सदा तुम्हरे गुण गाई ।।
और अवलम्ब न आस छुटै ,सब त्रास छुटे हरि भक्ति दृढाई ।।
संतन के दुःख देखि सहैं नहिं ,जान परि बड़ी वार लगाई ।।
एक अचम्भी लखो हिय में ,कछु कौतुक देखि रहो नहिं जाई ।।
कहुं ताल मृदंग बजावत गावत,जात महा दुःख बेगि नसाई ।।
मूरति एक अनूप सुहावन ,का वरणों वह सुन्दरताई ।।
कुंचित केश कपोल विराजत,कौन कली विच भऔंर लुभाई ।।
गरजै घनघोर घमण्ड घटा ,बरसै जल अमृत देखि सुहाई ।।
केतिक क्रूर बसे नभ सूरज ,सूरसती रहे ध्यान लगाई ।।
भूपन भौन विचित्र सोहावन,गैर बिना वर बेनु बजाई ।।
किंकिन शब्द सुनै जग मोहित,हीरा जड़े बहु झालर लाई ।।
संतन के दुःख देखि सको नहिं ,जान परि बड़ी बार लगाई ।।
संत समाज सबै जपते सुर ,लोक चले प्रभु के गुण गाई ।।
केतिक क्रूर बसे जग में ,भगवन्त बिना नहिं कोऊ सहाई ।।
नहिं कछु वेद पढ़ो, नहीं ध्यान धरो ,बनमाहिं इकन्तहि जाई ।।
केवल कृष्ण भज्यो अभिअंतर ,धन्य गुरु जिन पन्थ दिखाई ।।
स्वारथ जन्म भये तिनके ,जिन्ह को हनुमन्त लियो अपनाई ।।
का वरणों करनी तरनी जल ,मध्य पड़ी धरि पाल लगाई ।।
जाहि जपै भव फन्द कटैं ,अब पन्थ सोई तुम देहु दिखाई ।।
हेरि हिये मन में गुनिये मन,जात चले अनुमान बड़ाई ।।
यह जीवन जन्म है थोड़े दिना,मोहिं का करि है यम त्रास दिखाई ।।
काहि कहै कोऊ व्यवहार करै ,छल-छिद्र में जन्म गवाईं ।।
रे मन चोर तू सत्य कहा ,अब का करि हैं यम त्रास दिखाई ।।
जीव दया करु साधु की संगत ,लेहि अमर पद लोक बड़ाई ।।
रहा न औसर जात चले ,भजिले भगवन्त धनुर्धर राई ।।
काहे विलम्ब करो अंजनी-सुत,संकट बेगि में होहु सहाई ।।

इस संकट मोचन का नित्य पाठ करने से श्री हनुमान् जी की साधक पर विशेष कृपा रहती है, इस स्तोत्र के प्रभाव से साधक की सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी होती हैं .
पंचमुखी हनुमानजी पंचमुखी हनुमानजी Reviewed by Unknown on July 16, 2012 Rating: 5

संकट मोचन हनुमान गायत्री मंत्र

January 17, 2012

हिन्दू धर्म में एक ही ईश्वर अलग-अलग देवशक्तियों के रूप में पूजनीय है। वैसे तो हर देव शक्ति कल्याणकारी ही होती है, लेकिन धर्मशास्त्रों में सांसारिक जीवन की कामना विशेष को पूरा करने या दोष-बाधाओं को दूर करने के लिए विशेष देव शक्तियों की उपासना विशेष फलदायी मानी गई है।
मातृशक्ति गायत्री को भी परब्रह्म यानी सर्वशक्तिमान ईश्वर माना गया है। गायत्री साधना भी 24 देवशक्तियों से जोडऩे वाली मानी गई है यानी सिर्फ गायत्री उपासना से 24 अलग-अलग देवताओं की उपासना से मनचाहे फल पाए जा सकते हैं। जिसके लिए गायत्री मंत्र के साथ इन 24 देवताओं के अलग गायत्री मंत्र के स्मरण का महत्व बताया गया है।
हर इंसान जीवन से जुड़ी विशेष कामनापूर्ति व समस्याओं, कमी या दोष से छुटकारे के लिए उसी गुण और शक्ति वाले देवता की गायत्री का स्मरण करे तो बहुत ही शुभ फल प्राप्त होते हैं।
गायत्री की इन 24 देवशक्तियों में एक है – श्री हनुमान। जिनकी उपासना शक्ति और समर्पण का भाव जाग्रत करने वाली मानी गई है। जिसके लिए हनुमान गायत्री मंत्र असरदार माना गया है।
व्यावहारिक जीवन के नजरिए से श्री हनुमान गायत्री मंत्र का स्मरण इंसान को निडर, संयमी, धैर्यवान, जिम्मेदार, समर्पित, विश्वासपात्र और गुण संपन्न बना देता है। जानते हैं यह श्री हनुमान गायत्री मंत्र और सरल पूजा विधि -
- प्रात: स्नान कर देवालय में माता गायत्री व श्री हनुमान की लाल चंदन, अक्षत, लाल पुष्प अर्पित कर पूजा करें।
- इस सामान्य पूजा के बाद घी का दीप जलाकर पहले माता गायत्री का ध्यान गायत्री मंत्र की एक माला यानी 108 बार बोलकर करें।
- इसके बाद श्री हनुमान का ध्यान व अमंगल और अशुभ को टालने की कामना करते हुए श्री हनुमान गायत्री का नीचे लिखा मंत्र की एक माला यानी 108 बार बोलें -
ॐ अंजनीसुताय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो मारुति: प्रयोचदयात्।।
पूजा और मंत्र जप के बाद माता गायत्री और श्री हनुमान को मिठाई, फल या सूखे मेवों का भोग लगाकर गायत्री आरती और हनुमान आरती करें।
- इस दौरान हुए जाने-अनजाने दोषों की क्षमाप्रार्थना कर आरती और प्रसाद ग्रहण करें।
- समयाभाव से अगर उपरोक्त मंत्रों की एक माला संभव न हो तो कम से कम 11 बार श्रद्धा से मंत्र जप भी शुभ फल देता है।
संकट मोचन हनुमान गायत्री मंत्र संकट मोचन हनुमान गायत्री मंत्र Reviewed by Unknown on January 17, 2012 Rating: 5
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